Ayurveda । आयुर्वेद



सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ।। 


आयुर्वेद एक परिचय 

चिकित्सा शास्त्र का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना की मानव जाति का... 

जी हाँ ! आपने सही सुना... आयुर्वेद का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है ।आयुर्वेद हमारे ऋषिमुनियों द्वारा दी गयी बहुमूल्य धरोहर है । जिसकी विशेषताओं व उपयोगिता का वर्णन किसी भी लेख या शब्दों में करना बहुत ही मुश्किल है । आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम निरापद चिकित्सा पद्धत्ति में सुमार है जो आज भी उपचार पद्धत्ति में सबसे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । जिसका सर्वप्रथम वर्णन अथर्ववेद में मिलता है । आज भारत ही नहीं बल्कि विदेशी वैज्ञानिक भी आयुर्वेद के आधार व इसके मूल सिद्धांतों का अध्ययन करके बहुत ही अंचभित हो जाते है व वैज्ञानिक रूप से आयुर्वेद की उपयोगिता को मान्यता प्रदान करते है । 

आर्युवेद का इतिहास ः - 


आर्युवेद का उल्लेख विश्व की प्राचीन धर्म ग्रंथ अथर्ववेद में किया गया है । जिसमें बताया गया है कि... पृथ्वी पर जब विभिन्न प्रकार की बिमारियों का प्रकोप फैलने लगा तब हिमालय में तपश्चर्या करने वाले ऋषि (वैज्ञानिक) लोग जन-स्वास्थ्य को लेकर चिंतित होने लगे व इसका समाधान खोजने के लिए संभाषा (Conference) हेतु हिमालय में एकत्र हुए । संभाषा में आयुर्वेद के ज्ञाता इंद्र के पास जाना तय हुआ, इसके लिए महर्षि भारद्वाज को आयुर्वेद अध्ययन के लिए चुना गया । इसके बाद महर्षि भारद्वाज जी ने इंद्र से तीन सूत्रों में पूरे आयुर्वेद का स्वस्थातुर परायण (Preventive & Curative) ज्ञान प्राप्त किया । 
ये तीनों सूत्र इस प्रकार है ः-  (1) रोग के कारण, (2) लिंग (लक्षण), (3) औषध । 
इसके उपरान्त महर्षि भारद्वाज जी ने अन्य सभी ऋषियों को आयुर्वेद से शिक्षित किया तथा अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने शिष्यों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया । सभी शिष्यों ने फिर अपनी-अपनी संहिताओं (पुस्तकों) का निर्माण किया, जिसमें अग्निवेश तंत्र (चरक संहिता), भेल संहिता, सुश्रुत संहिता आदि प्रमुख है । इस प्रकार अष्टांग आयुर्वेद जिसमें काय चिकित्सा (General Medicine), बाल चिकित्सा, ग्रह रोग, उर्ध्वजत्रुगत रोग (ENT), शल्य चिकित्सा (Surgery), विष चिकित्सा (Toxicology), रसायन व वाजीकरण इन आठ शाखाओं का प्रचलन शुरू हुआ । 
मध्यकाल व उसके बाद के विदेशी आक्रमणों व परतन्त्रता के कारण आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार व अनुसंधान बाधित हो गया । स्वाधीनता के बाद एक बार पुनः आयुर्वेद चिकित्सा पद्धत्ति अपने वैभव की ओर अग्रसर होने लगी है । आज के आधुनिक काल में एलोपैथी के दुष्प्रभावों (Side Effects) के कारण पूरा विश्व भारत की इस प्राचीन चिकित्सा पद्धत्ति की ओर रोगमुक्त समाज निर्माण की कल्पना के साथ आशा भरी नजरों से देख रहा है । 

आयुर्वेद के सिद्धांत ः- 


पंञ्च महाभूत ः- आयुर्वेद के अनुसार सभी सजीव व निर्जीव वस्तुए पंच महाभूतों से निर्मित है तथा हमारा शरीर भी इसी आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृ्थ्वी इन पांच महाभूतों से बना हुआ है । किसी एक या एक से अधिक महाभूत की शरीर में कमी या अधिकता रोग को उत्पन्न करती है अतः महाभूतों के संतुलन हेतु संम्बधित आहार-विहार व औषधि द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है । 

त्रिदोष ः- समस्त जगत को जिस प्रकार सोम (चन्द्रमा), सूर्य तथा वायु संचालित करती है उसी प्रकार हमारे शरीर की सभी क्रियाएं वात, पित्त व कफ इन त्रिदोषो द्वारा संचालित किया जाता है । किसी भी दोष की अधिकता व कमी शारीरिक रोग का कारण होती है तथा तीनों दोषों की सम अवस्था (Balance) आरोग्य प्रदायक है । अतः विभिन्न औषधि द्रव्यों का प्रयोग कर दोषों को समावस्था में लाया जाता है । 

त्रिगुण ः - मानसिक स्वास्थ्य के लिए सत्व, रज व तम त्रिगुणों की साम्यावस्था आवश्यक है, इसके असंतुलन के कारण भी रोगों की उत्पत्ति होती है । अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए सात्विक आहार-विहार एवं औषधि का प्रयोग किया जाता है । 

सप्त धातु ः - हमारे द्वारा ग्रहण किये आहार द्रव्यों का उचित परिपाक होकर रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र ये सप्त धातुओं का क्रमशः निर्माण होता है जो कि शरीर के समस्त घटकों का निर्माण करता है । दूषित आहार करने से धातुए दूषित होकर रोग का कारण बनती है । 

दिनचर्या ः - आयुर्वेद में औषधि के साथ-साथ व्यक्ति के स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए दिनचर्या, ऋतुचर्या, तथा रात्रिचर्या का पालन आवश्यक है । जिसमें मौसम के अनुसार खान-पान तथा रहन-सहन का उल्लेख किया गया है । साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए सद्प्रवृत्ति के बारे में बताया गया है । 

आज के समय में आयुर्वेद की आवश्यकता ः - 


आयुर्वेद सिर्फ रोगों के इलाज तक ही सिमित नहीं, बल्कि यह आहार-विहार, जीवन मूल्यों, स्वस्थ जीवन व नीरोगी रहने की सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करता है । वास्तव में यदि हम आयुर्वेद के सिद्धातों को हमारे दैनिक जीवन में अपना ले तो, शरीर कभी बीमार ही नहीं होगा । 

आधुनिक जीवनशैली, आहार-विहार, नशा, प्रदुषण, बढता हुआ केमिकल्स का उपयोग आदि की वजह से हमारे शरीर में रोग पैदा करने वाले विजातीय द्रव्य बनना शुरू हो जाते है । जिसके फलस्वरूप रोग एवं रोगियों की संख्या धीरे-धीरे बढ रही है । 

तो क्या शरीर एवं मन को स्वस्थ रखने के लिए और रोग होने पर रोग मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है ??? 
क्यों नहीं इस समस्या का एक ही उपाय है और वह है .... 

शुद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सा 
Treditional Ayurvedic Treatment

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