गृहस्थी जीवन के सात (7) सुख



        शास्त्रों में गृहस्थी जीवन के 7 सुख बताये गये है । जो कि सभी के जीवन में होने आवश्यक है अन्यथा इनमें एक की कमी भी आपके जीवन को कष्टमय बना देगी और फिर आप जीवन के आगे की यात्रा को ठीक से पुरा नहीं कर पायेगें । अगर आपके जीवन में भी किसी सुख की कमी है तो शास्त्रों में बताए अनुसार से उसे अवश्य पुरा करना चाहिए । परन्तु आज हम आपको 8 सुख के बारे में बताएगें जो आपने पहले कभी नहीं सुना होगा .... 

पहला सुख - निरोगी काया ः 

अर्थात -  हमारे शरीर में किसी भी प्रकार का कोई भी रोग नहीं होना चाहिए, कोई बिमारी नहीं होनी चाहिए, कोई कष्ट नहीं होना चाहिए, किसी भी प्रकार की पीड़ा से मुक्त शरीर ही पहला सुख माना गया है । 

दुसरा सुख - घर में माया ः

अर्थात ः - जीवन जीने के लिए, दान-पुण्य करने के लिए और आनन्द से जीवन व्यतीत करने के लिए हमारे पास पर्याप्त धन होना आवश्यक है । 

तीसरा सुख - पुत्र आज्ञाकारी ः 

अर्थात ः- यदि किसी के पास अपार धन-दौलत हो रूप हो गुण हो ऐश्वर्य हो इज्जत हो लेकिन यदि उसका पुत्र उसकी ही आज्ञा नहीं मानता है तो वे तमाम सुख-सुविधाएं उसके लिए नर्क के समान है पुत्र का आज्ञाकारी होना अति आवश्यक है । 

चौथा सुख - सुलक्षणा नारी ः

किसी भी स्त्री के विवाह उपरान्त उसे उस पुरूष की धर्मपत्नी कहा जाता है अर्थात पुरूष के सभी सुख-दुख में उसका भी आधा हिस्सा हो जाता है । इसलिए सभी प्रकार के सुख सुविधाएं होते हुए, स्त्री के रूप सौंदर्य होते हुए और विभिन्न प्रकार के विलासिता के साधन होते हुए भी यदि पत्नी अच्छे लक्षणों वाली नहीं है तो समाज में अपयश होगा और जीवन में सुख नहीं हो सकता इसलिए पत्नी का सुलक्षणा होना भी अति आवश्यक है । 

पांचवा सुख - राज में पाया ः

अर्थात - घर में यदि मुख्य पूरूष की सरकारी नौकरी हो या वह राज्य के कार्यों से जुड़ा हुआ हो अथवा राज्य से उसको आमदनी प्राप्त होती हो और राजकाज के काम आसानी से हो जाते हो । 

छठा सुख -  पड़ोसी भाया ः

अर्थात - हमारे पड़ोस में रहने वाले लोग इस प्रकार के होने चाहिए कि हमारे विचार उनसे मिलते-जुलते हो और हमारे सुख-दुख में सहयोगी होने चाहिए अन्यथा सभी प्रकार की सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी यदि पड़ोसी हमसे द्वेष भावना रखता है हमसे कपट व्यवहार करता है और हमारी हानि करने वाला है तो यह भी एक प्रकार का दुख है । इसलिए पड़ोसी का अच्छा होना भी एक सुख माना गया है । 

सातवां सुख - माता-पिता का साया ः

जिस व्यक्ति के गृहस्थी जीवन में भी माता-पिता जीवित होते है, उससे भाग्यशाली व्यक्ति इस पूरी दुनिया में नहीं है, वह व्यक्ति सभी सुखों को पा लेता है । जो व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है, उसके माता-पिता के साथ-साथ उसके पितरों का भी आर्शीवाद उस पर बना रहता है । माता-पिता का जीवित रहना भी एक प्रकार का सुख है । 

ये तो हुआ गृहस्थी जीवन के 7 सुख जो कि शास्त्रों में बताये गये है । इसके अतिरिक्त भी एक सुख माना गया है और वह सुख है पुत्री का ........... 

आठवां सुख - पुत्री का साया ः

वैसे तो सुख सात ही प्रकार के बताये गये है । परन्तु जिस घर में पुत्री ना हो उस व्यक्ति पर कन्यादान का ऋृण सदैव बना रहता है । और वह उस ऋृण से तभी मुक्त होगा जब वह कन्यादान कर दे । इसलिए घर में कन्या का होना आठवां सुख माना गया है । 

        शास्त्रों में जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष बताया गया है अर्थात सुखपुर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने के उपरांत व्यक्ति को इन सभी सुखों का त्याग करके मोक्ष के मार्ग पर चल देना चाहिए । 
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